तराशने चली हूँ आज खुद को
कभी अपनी राह संभालती थी
आज वक़्त संभलता है मुझे
राहे अनकही, मंज़र अनकहे
आज फिर तराशने चली हूँ में खुदी को
वो पल थे,जब में राहे तराश रही थी
अंजान राहो पर चलती जा रही थी
अपनी खुदी को में खोती जा रही थी
लम्हे तराष्टी थी,मंज़िलो पर छड़ती थी
नये लम्हो को ढूंडती, नये पलो को जीती थी
पर कही में खुदी को खोती चली जा रही थी
आज में डरती हूँ इन राहो से ,इन लम्हो से
खुदी की परछाई पढ़ा करती हूँ
मंज़िल को नज़दीक पाती हूँ
पर रिश्तो की मासूमियत
खुद की मस्ती, और खुशी
तराशने चली हूँ आज खुद को
होसला लिए चली हूँ
वादा हैं यह खुदी से
खोई हुई में,खुद को तराशुंगी
ज़िद्द है की पहाड़ो पर छड़ूँगी
फिर परछाई से मिल जाओंगी
आज में खुद को तराश कर
फिर कभी खुद से रुक्सत ना हो पाओँगी
थोड़ी खुदी, थोड़े मंज़र
फिर यह कलम उकेरेगी
फिर में वही पहली सी हो जाओंगी
फिर में अपनी खुदी में समा जाओंगी

