Sunday, 30 September 2018


ज़रा सा भी ऐतबार न किया मेरा 
इस तरह रुक्सती न करें मुझसे 
यह जान ऐतबार की रस्म बांधती हैं 
तू मेरी रूह हैं और अब वह भी रुक्सत मांगती हैं 
तेरी इस तरह यूँहि नाराज़गी 
मेरे जीते जी मेरी जान मांगती हैं 
ज़रा सा भी ऐतबार न किया मेरा
यह रातें अब नही कटती मुझसे 
मेरी शमा का परवान यूँहि चढ़ाये 
मेरी सुबह की अज़ान तेरे बिना अपनी सुबह नहीं मानती हैं 
आँखे नम हैं मेरी आज 
तेरी रुक्सती मुझसे अब सेहन नहीं होती 
ज़रा सा भी ऐतबार न किया मेरा
कि अब यह शमा मेरी सुबहो का परवान चढ़ा रही हैं 
तेरी इस तरह यूँहि नाराज़गी
मेरे जीते जी मेरी जान मांग रही हैं| 


Saturday, 3 October 2015

नज़्में क्या है 
आलापों से उभरी चीख
नहीं
झरने में फसा कराहता हुआ सा मेंढक
नहीं
वह भला कैसे हो सकता है
बारिश के पानी से बेहता हुआ तिनका
नहीं
हाथो की लकीरे
नहीं
फिर आखिर नज़्में क्या है
किसी तितली के उड़ने का अंदाज़
नहीं नहीं
वह भी भला कैसे हो सकता है
लक्षो से बेखबर राही
प्रेम की बाहो में सिमटे आसु
नहीं 
नहीं,फिर क्या है यह नज़्म
खुली आज़ादी में पिरोहे हुए शब्द
गगन की चोटियों को चूमती फिज़ाएँ 
झिलमिल तारो की दुनिया
परियो की कहानी
परिंदो की आवाज़
पल में प्यार
पल में दुःख
पर मन विशाल
इतना विशाल की दुनिया समां जाए
हाँ
हाँ,यही है नज़्म
नज़्म की पहचान यही है मेरे लिए
हाँ यही है नज़्म



Wednesday, 23 September 2015



दुखी मन 
ख्वाबों को सजा
ज़रा इतरा
सुरमा ख़ुशी का लगा
जस का तस बादलो में फ़सा
अटका सा 
अरमान अब तू सजा
दुखी मन 
ख्वाबों को सजा
लाइयां नौनिहाल सी ख़ुशी
फिर तू उमंग से भर जा
झरोखें से झांकती हुई सी
कुछ ख़्वाब तू सजा
नज़रो को उठा
कुछ ख्वाब तो सजा
दुखी मन
ख्वाबों को सजा
तिनको को सुखा कर
सुख सागर सा बन जा
तरैयाँ छटे
मेघ से पटे
बारिश की बूंदो सा
अहसास तू दे जा
दुखी मन 
ख्वाबो को सजा
नशा सा मदमस्त
बादलो से ढका
चऊ और तू झा सा जा
दुखी मन
ख्वाबों को सजा
टुकड़े जो टूटे हुए से
बिखरे गमो को बता
दास्तान दरपण की नहीं
लबो से रूह तक तू ठहर जा
दुखी मन
अब तोह तू ख्वाबों को सजा




Tuesday, 23 June 2015


एक पहेली सा, सुकून का साया लिए
तेरी आदते,तेरी रूह की पहचान लिए
अपनी मासूमियत को इतलाह करने
फ़िज़्ज़ाओं में अपनी भीनी सी महक करने
दिल को एक एहसास
एक सुकून का अहसास
रूह को जैसे भा सा गया था तू
फ़िज़्ज़ाओं की भीनी सी महक में जैसे
जैसे समां गया था तू

एक पहेली सा, सुकून का साया लिए
समुद्र की सीपियाँ,कभी तराशती थी में कही
अंदर से इतना कोमल,इतना प्यारा
नज़ारे मेरे तो जैसे देखते ही बनते थे
मेरी नींदों में जैसे तू सोया करता था
फास्लो से भी जैसे तू भाया करता था
रूह को जैसे भा सा गया था तू
फ़िज़्ज़ाओं की भीनी सी महक में जैसे
जैसे समां गया था तू

मेरी फ़िज़्ज़ाओ को उड़ान देना
तेरी खूबसूरत यादों में नाम देना
जहां की एह्तिहत
मेरी तो तुझमे ही है
सुधीर की पराकाष्ठा ज्ञात नहीं अभी मुझे
बस यही दिन ओस की चमकती बूंदो सा है मुझे
रूह को जैसे भा सा गया है  तू
फ़िज़्ज़ाओं की भीनी सी महक में जैसे
जैसे समां गया है  तू

Sunday, 8 February 2015



जहान की परवाह कर
निशाँ तरंगो की
लफ्ज़ क़ुदरत छेड़ती रहे
अल्फ़ाज़ में अपने पिरोके
कभी लहरो पर से
कभी लहरो में से
रोशनी उन बूँदो पर से
पर नज़दीक नज़दीकियो सी
जहान निसार कर हसरते
शब्द जैसे लहरो में बहते रहे
पर लहरें कुछ अंजान सी रहे
ज़िंदगी के इस मोड़ पर संजोई है
यादें दिल को झकझोर करती सी
कुछ कसर,कुछ कमी
लफ्ज़ क़ुदरत छेड़ती रहे
अल्फ़ाज़ में अपने पिरोती रहे
नज़रे मुझसे मिला
क्या तुझे कुछ नही दिखता
फिर क्यू,फिर क्यू तू मुझसे मिलता है
बात करता है,रूह मिलाता है
तू कही अनदेखा सा,बहुत प्यारा है
शायर सी ग़ज़ले,वो मेरे लिए
पर तू शब्दो को समझ क्यू नही पाता है
जहान की परवाह कर
निशाँ तरंगो की
लफ्ज़ क़ुदरत छेड़ती रहे
अल्फ़ाज़ में अपने पिरोके

Thursday, 23 October 2014




काश की ऐसा होता 
काश की वैसा होता
अल्फ़ाज़ में कही कुछ अटक नही जाता
रूह को कही सुकून हासिल हो जाता
माना की जन्नत से फासला काफ़ी है
पर मन्नत की नहमत भी यही है
और फिर होता भी तो यही है ना
की मिल कर कोई रुक्सत होता ही है ना
नयनो से बहता नीर भी तो फिर कभी 
 कभी खुशी के ख़्वाअब सा झलकता है
फिर दरिया सा शीतल हो अल्फ़ाज़ कही लिखता है ना
जाने या नही जाने हिमाकत की वजह भी यही है
काश की ऐसा होता
काश की वैसा होता

Wednesday, 6 August 2014


तराशने चली हूँ आज खुद को
कभी अपनी राह संभालती थी
आज वक़्त संभलता है मुझे
राहे अनकही, मंज़र अनकहे
आज फिर तराशने चली हूँ में खुदी को

वो पल थे,जब में राहे तराश रही थी
अंजान राहो पर चलती जा रही थी
अपनी खुदी को में खोती जा रही थी
लम्हे तराष्टी थी,मंज़िलो पर छड़ती थी
नये लम्हो को ढूंडती, नये पलो को जीती थी
पर कही में खुदी को खोती चली जा रही थी

आज में डरती हूँ इन राहो से ,इन लम्हो से
खुदी की परछाई पढ़ा करती हूँ
मंज़िल को नज़दीक पाती हूँ
पर रिश्तो की मासूमियत
खुद की मस्ती, और खुशी
तराशने चली हूँ आज खुद को

होसला लिए चली हूँ
वादा हैं यह खुदी से
खोई हुई में,खुद को तराशुंगी
ज़िद्द है की पहाड़ो पर छड़ूँगी
फिर परछाई से मिल जाओंगी
आज में खुद को तराश कर
फिर कभी खुद से रुक्सत ना हो पाओँगी
थोड़ी खुदी, थोड़े मंज़र
फिर यह कलम उकेरेगी
फिर में वही पहली सी हो जाओंगी
फिर में अपनी खुदी में समा जाओंगी