काश की ऐसा होता
काश की वैसा होता
अल्फ़ाज़ में कही कुछ अटक नही जाता
रूह को कही सुकून हासिल हो जाता
माना की जन्नत से फासला काफ़ी है
पर मन्नत की नहमत भी यही है
और फिर होता भी तो यही है ना
की मिल कर कोई रुक्सत होता ही है ना
नयनो से बहता नीर भी तो फिर कभी
कभी खुशी के ख़्वाअब सा झलकता है
फिर दरिया सा शीतल हो अल्फ़ाज़ कही लिखता है ना
जाने या नही जाने हिमाकत की वजह भी यही है
काश की ऐसा होता
काश की वैसा होता

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