Sunday, 8 February 2015



जहान की परवाह कर
निशाँ तरंगो की
लफ्ज़ क़ुदरत छेड़ती रहे
अल्फ़ाज़ में अपने पिरोके
कभी लहरो पर से
कभी लहरो में से
रोशनी उन बूँदो पर से
पर नज़दीक नज़दीकियो सी
जहान निसार कर हसरते
शब्द जैसे लहरो में बहते रहे
पर लहरें कुछ अंजान सी रहे
ज़िंदगी के इस मोड़ पर संजोई है
यादें दिल को झकझोर करती सी
कुछ कसर,कुछ कमी
लफ्ज़ क़ुदरत छेड़ती रहे
अल्फ़ाज़ में अपने पिरोती रहे
नज़रे मुझसे मिला
क्या तुझे कुछ नही दिखता
फिर क्यू,फिर क्यू तू मुझसे मिलता है
बात करता है,रूह मिलाता है
तू कही अनदेखा सा,बहुत प्यारा है
शायर सी ग़ज़ले,वो मेरे लिए
पर तू शब्दो को समझ क्यू नही पाता है
जहान की परवाह कर
निशाँ तरंगो की
लफ्ज़ क़ुदरत छेड़ती रहे
अल्फ़ाज़ में अपने पिरोके