अजीब वाक़ये है ज़िंदगी में
चाँद कही दूर है
लाखो नज़ारे पर
पर वो एक कुछ ख़ास है
मन कभी भागता है
कही दबी हुई चाहतो की अदा
नीलसमंदर सी गहराई
कही मन कुछ चाहता है
झरोखे में कही दफ़ा फसा है
फिर साहिलो के वेग सा उड़ा है
उड़ा है फिर कही दूर
सूफी बन्धिzए अधाओ में अपने ले
यह मन कही तो अटका है
तू ही बता ए दोस्त
नज़ारे और नज़रे
समेटता चलु या
या साहिलो के संग
संग चलती है यह भीड़
पर ख़याल तो बस उसी का है..
बस ख़याल अब उसी का है
यह मन कही तो अटका हुआ है
यह मन तो कही अटका है





